ऐसा मानने कि कोई वजह नहीं है कि पाकिस्तान की नागरीक सरकार इन मुंबई हमलों के षडयंत्र में शामिल हैं लेकिन पाकिस्तान में बहुत कुछ सरकार के नियंत्रण में नहीं है। सेना और आई एस आई को मनमर्जी की पुरानी आदत है। सेना को सत्ता पर सीधे नियंत्रण की आदत है और वो बहुत दिनों तक प्रष्ठभूमि में नहीं रह सकती. अभी तक अमेरिका अपने हितों की खातिर कभी पाकिस्तान को शाह देता रहा है तो कभी पाकिस्तानी सैनिक तंत्र और आतंकी गुटों की भारत के खिलाफ कारगुजारियों को नजरंदाज करता रहा है। लेकिन अब हालात बदल गए हैं, पाकिस्तानी आतंकी गुट और तालिबान अमेरिका को भी नुकसान पहुँचा रहे है। पाकिस्तान की कथनी और करनी में फर्क अमेरिका को भी नज़र आ गया है और इसीलिए अमेरिका ने जनरल मुशर्रफ़ से पल्ला झाड़ लिया।
आज पाकिस्तान में चुनी हुई सरकार है और मुंबई हमलों के चलते पैदा हुए चौतरफा दबाब से चुनी हुई सरकार के पास मौका है की वो पाकिस्तान में लोकतान्त्रिक संस्थाओं को मजबूत करे। सेना के पारंपरिक दखल और भ्रष्टाचार के चलते पाकिस्तान में लोकतान्त्रिक संस्थाएं हमेशा कमजोर रही हैं। मुंबई हमलों और उससे उपजे वैश्विक दबाब ने पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार को मौका दिया है की वो सेना की दखलंदाजी कम कर उसकी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं पर लगाम लगाए। इसके लिए उसे ISI के पर कतरने होंगें और पाकिस्तान में चलने वाले आतंकी कैम्पों को भी नष्ट करना होगा।
अगर पाकिस्तान इस समय अपने यहाँ से आतंकी गुटों का सफाया और सत्ता तंत्र में सैनिक हस्तक्षेप में लगाम लगाने में असफल रहता है तो यह भविष्य में पाकिस्तान के लिए नुकसानदेह साबित होगा। पाकिस्तान का सच दुनिया के सामने है और दुनिया की बर्दाश्त करने की सीमा टूटने के कगार पर है। अब निर्णय की घड़ी है, बेहतर होगा पाकिस्तान ख़ुद आतंक के कारखाने बंद करे, नहीं तो यह काम भारत या दुनिया के अन्य देशों को करना होगा और वो पाकिस्तान के लिए बहुत दुखदायी होगा।
